Saturday, 7 January 2017

वास्तव में ..

हम  सोचते है
कि पूरी दुनिया रूचि रखते है
कि हम क्या खाये थे सुबह नाश्ता में
और कब, क्या भोजन लिया,फलना रेस्टोरेन्ट से
इसलिए एफबी अपडेट.पल पल  करना  है..

हम  सोचते है
कि सारी दुनिया की नज़र
है हमेशा हम पर,
दिलचस्पी  रखते है कि
हमें प्रमोशन मिला है कि नहीं
 लड़का इम्तेहान में फ़ैल हुआ कि पास
क्या दफ्तर में बेइज़्ज़ती हुआ हैं ?

कभी कभी  शर्म से हम
छिपते रहते घर में
दूर रहते, शादियों से
व अन्य सामाजिक सम्मेलनों से ...

वास्तव में ऐसा नहीं, जैसे  हम सोचते है
दूसरों पर चिन्ता करने
किसके पास समय है ?
भूल चुके होते लोग
दो तीन दिन के चर्चे से
हर एक का है अपनी समस्या
जीवन तो है जीना है ...

16 comments:

  1. True, we give unnecessary importance to people around who hardly care - they may remark on our appearances and habits, but that is all that is to it.....In the ends, everyone has his/her own share of problems to deal with.

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    1. I read a similar remark in one of Dale Carnegie's book: A woman's toothache is of more concern to her than an earthquake in China. I am not sure if the context was the same; still, the message conveyed is similar to your opinion :-)

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    2. Yes, it's similar in the sense people have their own problems to bother about you for long periods as feared. Thank you Amit for sharing your thought!

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  2. Thank you Sunaina for going into the essence of the poem and sharing your thoughts!

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    1. Thank you so much Purba for your feedback!

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  4. वास्तव में .... आपने सही लिखा है राजीव जी। सुंदर प्रस्तुति।

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    1. शुक्रिया राकेशजी!

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  5. कभी कभी शर्म से हम
    छिपते रहते घर में
    दूर रहते, शादियों से
    व अन्य सामाजिक सम्मेलनों से
    बहुत बढ़िया ! राजीव जी

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    1. शुक्रिया योगीजी!

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  6. किसके पास समय है ?
    भूल चुके होते लोग
    दो तीन दिन के चर्चे से
    हर एक का है अपनी समस्या
    जीवन तो है जीना है ...
    एकदम सही बात
    बहुत सुन्दर रचना

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    1. शुक्रिया कविताजी!

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  7. True very true, even we forget till FB reminds us about something in the memories!

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  8. Thank you so much for your feedback Mridula!

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  9. सच कहा है ... जीवन है स्संसें है तो जीना जरूर चाहिए ... और न चाहने से भी क्या ... जीना तो है ही ..

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  10. बहुत धन्यवाद दिगंभर जी अपने विचार यहाँ रखने केलिए !

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