Saturday, 17 December 2016

शिकायत

आज के ज़माने में  शिकायत ही शिकायत  है
पति  को  पत्नी से   शिकायत
पत्नी को पति से  शिकायत
अधिकारियों को कर्मचारियों से शिकायत
और  कर्मचारियों का है अधिकारियों से  शिकायत

सब  समझते है दोष दुसरे का है
खुद  तो है, सही हमेशा
कोई कहते है
"आज के बच्चे बिगड़ गए  है "
तो कोई मानते है कि  "मेरे पिता
न मुझे या  बदली दुनिया को  समझता"

लेकिन इन शिकायोतों से क्या फायदा
एक दुसरे को न समझना
कलह होना  स्वाभाविक है,
कलयुग में जो  हम रहते है !
शिकायत,और ज़्यादा शिकायतों से
बात बढ़ती है, होती ख़राब!

इस संकट का निवारण हो सकता
सिर्फ प्रेम और सहन  शक्तियों से
शिकायत का जवाब प्रेम से
कड़वे  बोलों के जवाब मीठे बोलों से

पहला  कदम उठाने से
थोड़ा सहन शक्ति भी दिखाने  से
मिट जायेगा शिकायत,
अपना, और दूसरों का
और  संबंधों रहे  सदा बहार !

NB: यह कविता बीके  ( ब्रह्मकुमारीज)  की  पढाई से प्रेरित है 


14 comments:

  1. सच में, आत्मसंयम रखने से बहुत सी समस्याएँ उठेंगी ही नहीं । और जो हैं, वे बढेंगी नहीं ।

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  2. Very well written. Totally agree with you :)

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    1. शुक्रिया राकेशजी!

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  4. Bahut badhiya. Bahut acche! :)
    Well written. Agree with you :)

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    1. Thank you so much! Motivates me to write more in Hindi.

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  5. बहुत ही सुंदर रचना की प्रस्‍तुति। मुझे बेहद पसंद आई। कीप राइटिंग सर।

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  6. बहुत धन्यवाद जमशेद जी!

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